हमें अपने लेख आलेख , कविता , कहानी , सामाजिक गतिविधियाँ , सामाजिक युवा पीढ़ी की गतिविधियाँ , कृषि के क्षेत्र में किये गए हमारे मुलभुत उपलब्धियां ऐसे हर वो जानकारी जो आप अपने साथ-साथ समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुचाना चाहते हैं ! सहर्ष आमंत्रित है ....

   हमारे समाज का संगठन

              श्री चन्द्रनाहू समाज के संगठन के बारे में श्री दुलार सिंह शास्त्री, श्री अवधबिहारी सिंह एवं ठाकुर रतनसिंह ने मिलकर 1930 में विचार विमर्श किये ! इन्होने ने मिलकर सामाजिक संगठन के नियमो के बारे में चिंतन किया और संगठन से जुड़े रहने के लिए समाज के प्रतिष्ठित व्यक्तियों को प्रेरित किया ! सन 1932 में पहला अधिवेशन जांजगीर चाम्पा जिले के कांसा नामक गाँव में किया ! वहा के मालगुजार श्री मोहरसाय चन्द्रनाहू को पहले सभापति तथा श्री अवधबिहारी जी को उपसभापति बनाया गया ! श्री शास्त्री जी एवं ठाकुर रतनसिंह जी समाज के संरक्षक के रूप में कार्य करते रहे ! उस समय कार्यकाल की कोई सीमा नहीं होती थी ! सामाजिक विचार विमर्श केवल बड़े-बड़े मालगुजार एवं समाज के प्रतिष्ठित लोगो तक ही सिमित रहता था जिसमे सारंगढ़ क्षेत्र के उलखर, बरदुला, बालपुर, कोसीर एवं कुम्हारी के मालगुजार प्रमुख होते थे ! जांजगीर तहसील में मुख्यतः कोट के श्री रघुवर प्रसाद चन्द्रा, कांसा के श्री केशव प्रसाद, भोथिया के श्री मनमोहन सिंह, ओड़ेकेरा के श्री मालिकराम, दुर्पा के श्री कुंजबिहारी, करिगांव के श्री अवधबिहारी, बंसुला के श्री शास्त्री जी एवं सलनी के श्री ठाकुर रतनसिंह जी होते थे ! चन्द्रनाहू समाज हसदेव, महानदी, मांड एवं इसकी सहायक नदियाँ सोन, बोराई एवं बगान नदी की उपजाऊ तारे एवं कछारों में मध्यप्रदेश के बिलासपुर एवं रायपुर संभाग में बहुतायत से निवास करते है ! परन्तु स्वाधीनता के बाद भारत वर्ष के प्रत्येक प्रदेश में जीविका हेतु व्यापर, कृषि एवं शासकीय सेवा में कार्यरत है ! "51" वर्ष पूर्व से समाज की रुढ़िवादी प्रथाओं को बदलने एवं समाज उत्थान की समयानुकूल व्यस्था स्थापित करने की सद्भावना से संगठन के कार्यों को क्रमशः बढ़ाते हुए समाज के माननीय कर्णधारो द्वारा जिस कल्प वृक्ष का रोपण किया गया था उसकी मनोरम सुखद छाया में अर्हनिहिश, निरंतर,सुमधुर, फूलो-फलों का उपभोग समाज को वर्तमान एवं भविष्य में आशा की स्पष्ट किरण दिखलाई दे रही है ! समाज की विकाश की गति आगे बढ़ने वाले पूजनीय स्वर्गीय श्री दुलार सिंह शास्त्री मुकाम- बंसुला , श्री आनद राम जी मालगुजार भोथिया , श्री रतन सिंह जी प्रख्यात अधिवक्ता सलनी , श्री हीरालाल जी लखाली , श्री डाहारु सिंह जी सकर्रा एवं श्री अवधबिहारी सिंह जी चन्द्र स्नातक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का समाज आभारी है एवं ये सामाजिक इतिहास में चिर्स्मर्निय रहेंगे !
              तदन्तर समाज के प्रमुख व्यक्ति स्व.श्री मनमोहन सिंह भोथिया, स्व. श्री कृष्णचंद्र जैजैपुर, स्व. श्री हीरालाल हरेथिकला, स्व. श्री सरधाराम ठुठी, स्व. श्री केशवप्रसाद कांसा, स्व. श्री अवधराम उल्खर, स्व. श्री अघोरिप्रसाद सरहरगढ़, स्व. श्री कुंजबिहारी कठेला दुरपा, स्व. श्री पदुलाल सुलौनी, स्व. श्री द्वारिका प्रसाद कोसीर, श्री गुरुदेव प्रसाद कटेकोनी, श्री कशाल प्रसाद लखाली, स्व. श्री राजाराम मरघटी, श्री हेतराम सकर्रा, श्री लक्ष्मण प्रसाद बरतुंगा, श्री ननकी सिंह कटेकोनी, श्री रामसेवक मलनी, श्री भगतराम बरगांव, स्व. श्री चतुर्भुज बरदुला, श्री दयाराम कुम्हारी, स्व. श्री ताराचंद ठठारी आदि ने समाज में समयोचित विशेष उल्लेखनीय प्रसंसनीय कार्य किये अतः सामाजिक इतिहास में हमेसा याद किये जायेंगे ! इसके बाद श्री ताराचंद जेठा, श्री लक्ष्मीनारायण भोथीडीह, डा. नवमान सिंह हरेठिकला, डा. शिवदयाल सरहर, श्री अवधराम रायगढ़, श्री सुखदेव प्रसाद वर्मा, श्री सोमनाथ कांसा, श्री परमानन्द कुटराबोड़, श्री बेदराम चन्द्रा, श्री साधुराम दतौद, श्री भुवनेश्वर सिंह ओड़ेकेरा का समाज के विकास में सराहनीय विकास रहा है !
              इसके साथ ही सन सत्तर के दशक के सुरुआत में श्री ईश्वरी लाल चन्द्रा लखाली के नेतृत्व में चन्द्रनाहू शिक्षित जातीय विकास समिति बनी जो तत्कालीन जातीय समाज सभापति स्व. श्री अवध बिहारी सिंह चन्द्रा के साथ मिलकर सराहनीय कार्य किये ! जिससे समाज के नवयुवको को जाग्रति की प्रेरणा मिली, जिसके फलस्वरूप बल-विवाह प्रथा पर रोक तथा मृत्यु भोज पर अवांछनीय खर्च मीठा, लड्डू, जलेबी एवं मालपुवा, खीर खाने खिलाने पर प्रतिबन्ध लगाकर प्रसंसनीय कार्य किया गया !               हमें हर्ष हो रहा है की काफी परिश्रम एवं निष्पक्षता के साथ समाज के सर्वतोमुखी आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक विकास के लिए सामाजिक एकता, न्याय एवं वैचारिक सामंजस्यता सुनिश्चित करने के लिए माननीय स्व. डा. स्वर्ण सिंह जी लाल वरिश भूगर्भ शास्त्री पि.एच.डी.(सोवियत संघ रूस) के सकारात्मक सहयोग से सन 1982 में समाज का पंजीयन कराकर एवं वार्षिक महासभा में संसोधित किये गए संविधान एवं नियमावली को सभी की जानकारी व पालन हेतु केंद्रीय महासमिति द्वारा उपलब्ध करायी जा रही है ! प्रस्तुत संविधान एवं नियमावली में सामाजिक सांस्कृतिक, परम्परायें एवं मान्यताओं को अक्षन्य तथा समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे- शादी-विवाह, जन्म-मरण संस्कारों में अपव्यय रोकने एवं शिक्षा का प्रसार विशेषतः नारी शिक्षा को प्रमुखता एवं बढ़ावा देने का प्रयास किया गया है !
             वर्तमान राजनैतिक परिवेश में सम-जातियों के साथ एकता अवश्यक है ! अतः पिछड़ी जातियों के साथ विचारधारा में एकरूपता लाकर राजनीती में अग्रसर होना समय की पुकार है ! ताकि पिछड़ी जातियों के साथ समभाव से पारस्परिक समन्वयक स्थापित कर खेतिहार जातियों को उनके वास्तविक अधिकार सुलभ कराये जा सके !
             तदुपरांत 39 वें महा अधिवेशन दिनांक 15 - 16 एवं 17 मई सन 1982 को ग्राम सकर्रा में शिक्षित युवाओं को इस विश्वास के साथ नेतृत्व प्रदान की गई, ताकि समाज में रुके हुए कार्य में गति आने तथा महासमिति पर स्वजातीय महानुभावो की की आस्था जगाने एवं चाहुमुखिं विकाश के लिए आशान्वित करने का उत्तरदायित्व इंजी. श्री चैतराम चन्द्रा जी अध्यक्ष ठुठी, श्री गिरधर प्रसाद, श्री विष्णुदयाल, श्री कौशल प्रसाद महासचिव, श्री भगवत प्रसाद उपाध्यक्ष, श्री श्यामलाल सकर्रा, श्री धनन्जय प्रसाद कोसीर, श्री नारायण सिंह सरहरगढ़, श्री गोपालराम दतौद, श्री अगरदास, श्री रामकुमार वर्मा, श्री बरनलाल, श्री रामदीन, श्री देवदत्त, श्री भगत राम, श्री युवराज सिंह चन्द्रा जैसे उत्साही एवं कर्मठ युवाओं के कन्धों पर भर सौपा गया, जिसे सन 1982 से 1994 तक लगातार 12 वर्षों तक सतत जागरूकता के साथ समाज के लोगो का विश्वास अर्जित करने में सफल रहे ! जिससे 24 - 25 दिसंबर सन 1995 में आयोजित महाधिवेशन ग्राम उल्खर में कमोवेश इन्ही नेतृत्व एवं समाज के अपेक्षित विकाश उपलब्ध करा सकें !
              प्रस्तुत सामाजिक संविधान एवं नियमावली 39 वाँ महाधिवेशन सन 1982 का संसोधित संस्करण सामाजिक सदस्यों के पालन हेतु उपलब्ध करायी जा रही है ! किसी भी समाज में विकास को गति प्रदान करने के लिए अनुशासन, धैर्य एवं एकता की आवश्यकता होती है, जो की प्रस्तुत संविधान के पलक में सन्निहित है ! आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है की जातीय नियमावली का पालन करते हुए महासमिति को सर्वसाधारण से पूर्ण सहयोग हेतु अपेक्षित है !
                            "उद्यमेन ही, सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथ्यैः"
              तात्पर्य यह है की मन की इच्छा करने से ही सफलता नहीं मिलती बल्कि उद्यम अर्थात परिश्रम से ही सफलता अर्जित की जा सकती है ! तदनुरूप वर्तमान केंद्रीय महासमिति पुरे आत्मविश्वास के साथ उपरोक्त वांछित सफलता प्राप्त करने हेतु दृढ प्रतिज्ञ हैं !
              वर्तमान समय में पदाधिकारियों का कार्यकाल 2 वर्ष का होता है ! समाज का संगठन गाँव से प्रारंभ होता है ! गाँव में जितने परिवार होते है उनमे से ग्राम प्रमुख, सचिव एवं कोशाध्यक्ष का चयन किया जाता है और उनके सहयोगी मिलाकर कुल 11 लोगो का ग्राम समिति गठित किया जाता है !
जिसमे कम से कम 2 महिला सदस्यों की नियुक्ति भी अनिवार्य किया गया है ! आस - पास के 5 से 10 गाँव (भौगोलिक क्षेत्र के आधार पर) को मिलाकर एक क्षेत्रीय समिति बनाया जाता है ! क्षेत्रीय समिति में कुल 11 सदस्य होते है जिसमे अध्यक्ष, सचिव, कोशाध्यक्ष एवं बाकि सभी सदस्य होते है जिसमे 2 महिला सदस्य होना अनिवार्य है ! सभी क्षेत्रीय समिति के सदस्य मिलकर केंद्रीय महासमिति के अध्यक्ष एवं महासचिव का चुनाव करते है ! फिर अध्यक्ष एवं महासचिव द्वारा कार्यकारिणी के सभी पदाधिकारियों व सदस्यों का चुनाव करते है ! वर्तमान समय में चन्द्रनाहू समाज लगभग 275 गावों में निवास कर रहे है ! रायगढ़ जिला में 20 गाँव, रायपुर जिला में 23 गाँव, दुर्ग जिले में भिलाई नगर 1 गाँव, बिलासपुर सहर में 1 गाँव, कोरबा में 23 गाँव, जांजगीर-चाम्पा जिले २०७ गाँव है ! साथ ही कर्मचारी/अधिकारी छत्तीसगढ़ , मध्यप्रदेश में कार्य करते हुए रह रहे है ! कुछ परिवार आजीविका हेतु दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, पंजाब आदि जगहों पर निवासरत है ! चन्द्रनाहू समाज के विद्यार्थी इंजीनियरिंग / मेडिकल आदि की पढाई हेतु अमेरिका, रूस, इंग्लैण्ड आदि जगहों पर रह रहे हैं !
             श्री चन्द्रनाहू समाज में चन्द्रा, वर्मा, चन्द्राकर, कठेल, लाल, चन्द्रम, चंद्रेश, चंद्रोषा, पान्डेल आदि उपनाम लिखे जाते हैं !




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