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   नारी का स्थान

                      जिस प्रकार तार के बिना विणा और धुरी के बिना रथ का पहिया बेकार हो जाता है उसी प्रकार नारी के बिना मनुष्य का सामाजिक जीवन । सृजन की प्रक्रिया में नर और नारी दोनों की सामान भूमिका है , फलतः नारी का समाज में बहुमूल्य स्थान है । भारतीय दर्शन में कहा भी गया है की जहा नारियों की पूजा होती है वहां देवता निवास करते है , इस तरह नारी की महिमा प्रतिपादित की गयी है । वैदिक काल में प्रत्येक धार्मिक अनुष्ठान में नारी की उपस्थिति आवश्यक थी । कन्याओं को पुत्रों के बराबर अधिकार प्राप्त थे उनकी शिक्षा-दीक्षा का समुचित प्रबंध था । मैत्रेयी, गार्गी जैसी स्त्रियों की गणना ऋषियों के साथ होती थी । कालांतर में नारी के सम्मान में विशेष धक्का लगा । नारियों को पर्दा में रखा जाने लगा । उससे शिक्षा और स्वतंत्रता के अधिकार छीन लिए गए ।
                      कृषि प्रधान चन्द्रनाहू (चन्द्रा) समाज के परिप्रेक्ष्य में भी उपरोक्त बातें लागु होती है । चन्द्रनाहू समाज में नारियों को सम्मान की नजर से देखा जाता है । चन्द्रनाहू समाज में दहेज़ प्रथा जैसी कुरीति की विभीषिका परिलक्षित नहीं होती है, समाज इस पर गर्व करता है ।
                      वर्तमान में नारी सकती के रूप में छात्राएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है । मेडिकल, इंजीनियरिंग, कला एवं विज्ञानं की शिक्षा प्राप्त कर राष्ट्र निर्माण में महती भूमिका का निर्वहन कर समाज के लिए अनुकर्णीय बन रही हैं ।
                      नारी विमर्श के सम्बन्ध में मैं अपने समाज का ध्यान इस और आकर्षित करना चाहता हूँ की हमारे समाज के संगठनों में नारियों की भूमिका नगण्य ही वरन शुन्य ही है । इसके लिए जवाबदारी वर्ग, पुरुष वर्ग ही है । समाज के उत्थान पर चर्चा-परिचर्चा में आधी आबादी का चुप या उदासीन रहना किसी भी सूरत में अच्छा नहीं कहा जा सकता है । राजनितिक संस्थाओं में भी हम नारियों को समुचित स्थान दिला पाने में असमर्थ हैं ।
                      लम्हों की खता की सजा सदियों को देना अच्छी बात नहीं है बल्कि समय रहते नारियों के प्रति हमें सकारात्मक सोच से ओत-प्रोत होकर नारियों की आत्मविश्वास को जागृत करना होगा । हमें नारियों की दशा एवं दिशा पर महती कार्य करने की आवश्यकता है । इसके लिए नारियों को भी स्वतः स्फूर्त सामने आना होगा ।
                      अंततः नारियों के उत्साहवर्धन में हम यही कहेंगे की -
                                           "नारी जब जगती है,
                                           तभी सुबह की सुरुवात होती ।
                                           रात्रि तभी विश्राम लेती है,
                                           जब नारी सोती है ।
                                           मत खेलना नारी की भावनाओं से,
                                           उथल-पुथल मच जाता है ।
                                           लंका धू-धू करके जलती है,
                                           जब नारी रोती है ।"
                                                                                                         




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